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  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

यहाँ चिराग तले ।जनकवि निर्दलबंधु

वह पहाड़ घोर समस्याओं में, वह जिंदगी अभाव तनावों में । यहां निर्बल अबोध असहायों में साक्षर सक्षमता भरी घर गांव में ।।

जन संघर्ष की कठिन राहों में कभी नींम कभी पीपल की छांवों में । अनगिनत पन्नों की कलम घिसी सब उड़ते रहे हवाओं में ।।

चंद जिंदगी की चंद कविताओं में और चंद गीत संगीत रचनाओं में । ढल गई जिंदगी यहां चिराग तले अंतः चेतना सचेतना संवेदना में ।।

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