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  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

सब्र करें हम नया भारत बनाएंगे ।

मोदी जी भूखे को रोटी दिखाने का काम कर रहे हैं न कि खिलाने का । बड़े बड़े विचारक समाजवादी व कलमकार भी तारीफ में आगे आ सकते हैं ।यह दिखाई गई रोटी करोड़ों को ललचा सकती है लग सकता है कि मोदी जी की सरकार निरंतर देश में छाई रहे ।

"हम तो भारत के आम नागरिक हैं। हम भी कुछ सोच सकते हैं और कुछ कह सकते हैं ।हम कहीं से भागकर नहीं आए हैं और ना हमने कहीं शरण ले रखी है। हम कितने हैं कहां हैं यह मोदी जी को पता नहीं है।"

"उनको पता है कि विरोधी दल जो भूल गए चूक गए या जो सोच ना सके जो कर ना सके उसी मुद्दे को कंधे में हवाई बंदूक तानकर इनको डराया जाए और जिनकी रोटी छिन रही है वह समझ सके कि देश का पहला ईमानदार चौकीदार है तो यही बंदूक वाला है ।"

तो इसी सिलसिले में काला धन, नोटबंदी ,जीएसटी ,स्वच्छ भारत, नमो गंगे ,आयुष्मान भारत ,धारा 370 या कश्मीर विभाजन ,अयोध्या मंदिर फैसला तथा आज नागरिकता संशोधन अधिनियम एक के बाद एक तुगलकी फरमान रातों-रात पलट का नजारा वास्तव में देश की दो तिहाई जनता को वल्टा पलटा गया ।

जनहित और राष्ट्रहित से जुड़ा कोई भी मुद्दा वास्तव में गलत नहीं होता है केवल उसे गलत बनाया जाता है बेवक्त में यह हवाई बंदूक काम नहीं आ सकती है ।जहां तक आज नागरिकता संशोधन अधिनियम का नजारा है इस पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस व उनके प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ने कड़ी आपत्ति जताई है कि विरोधियों के विचार अभिव्यक्त का हिंसक दमन अनुचित है। वही असदुद्दीन ओवैसी द्वारा संसद में बिल की प्रति फाड़ दी गई है। इसी विरोध में एक दर्जन दल सड़क मैदानों आ उतर पड़े हैं ।साथ ही मानव अधिकार आयोग के प्रमुख ने जिनेवा में स्पष्ट कह दिया है कि इस बिल की मूलभूत प्रकृति भेदभाव पूर्ण है ।

"मुख्यतः विरोध का आधार इस बिल में मुस्लिम समुदाय को शामिल न करना सामने आया है ।दिल्ली के अरविंद केजरीवाल का कहना है कि पहले यहां के नागरिकों का तो भला करें फिर और की बात करें तो देखा जाए तो यही विचार यह लिखने के लिए विवश कर गया कि मोदी जी कंधे पर हवाइ बंदूक तानना छोड़ दें अब बहुत हो गया है "।

"अब जहां तक सरकार व संसद की संप्रभुता व गरिमा का सवाल है इन बंदूक वालों ने उसे पहले ही समाप्त कर दिया है ।आप जानते हैं दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के पावन मंदिर में सत्तारूढ़ दल के ही सबसे अधिक चरित्रहीन अपराधी सीना तान खड़े हैं जिनका संचालन आसाराम जैसे गुरुकुल विधाता के सानिध्य में मोदी जी कर रहे हैं ।तो लोकसभा में जहां 80 विपक्षी मतों के मुकाबले 311 मतों से बिल पारित हुआ वही 105 विपक्षी मतों के मुकाबले 125 मतों से राज्यसभा में भी बिल पारित हुआ ।अब बिल के पक्षकारों का विरोधियों को देशद्रोही कहना और उन पर हिंसक दमनकारी फरमान झाड़ना उनका एक लोकतांत्रिक विवेक आधिकार बनने जा रहा है जो शरण में आए या लाए जाने वाले लोगों की टीस के घड़ियाली आंसू पोछ रहे हैं ।"

हम यह नहीं कहना चाहते हैं कि शरणार्थियों की उपेक्षा करो ।हम यही कहेंगे कि शरण में आए हुए की आत्मा को सुख पहुँचाओ चाहे दधीचि की तरह हड्डी तोड़ या दयालु शिवि की तरह मांस काटकर दान देना पड़े। शरण में आए हुए की रक्षा करना सर्वश्रेष्ठ मानव धर्म है ।मगर यही सबसे गौरतलब विषय है की शरण में आए हुए जहां या तो मनमोहन सिंह हुए या लालकृष्ण आडवाणी वही वह परिवार लगभग आधे से अधिक खाली हो गया जिसमें आज पुनः शरण में आए हुए या आने वालों की आवभगत का ज्वलंत नजारा सामने है ।

मैं उत्तराखंड का एक बेघर विस्थापित हूं। मैं 3 दसक से आज उतराखड की सवा लाख बेघर बिसस्थापित जनता के बन गांव में बैठा हूं ।मैं यहां पर दिन-रात निशुल्क जन सेवा संघर्ष को समर्पित हूं। सन 1993 में प्रिंट मीडिया से जुड़कर राष्ट्रीय जनसरोकारों को खुली आवाज दी है ।संगीत साहित्य व कला मंचन व लेखन कार्यों में असहाय संघर्ष झेले हैं ।मैंने 40 किमी घने जंगल पार बर्फीली थपेड़ों से टकर टकर पैदल मार्च कर या फिर बाघ भालुओं के बीच से गुजर कर या तमाम उपेक्षाओं उत्पीड़न व यातनाओं को झेलकर सामान्य इंटर के साथ ही 87% अंको स्टेनोग्राफी डिप्लोमा हासिल कर यहां अनन्य अबोध असहायों को साक्षर सक्षम बना कर जिंदगी देने का प्रयास किया है ।अधिक परिचय के लिए वर्तमान 3 वर्षों से रचना धीन मेरा बृहत काव्य संग्रह "युग चेतना संघर्ष संघ" आपके सामने आने ही वाला है ।इस सेवा संघर्ष में आज जो मैं देख या झेल रहा हूं इसका पता भी मोदी जी को नहीं है ।

उस परिवार में जहां आज शरण में आने वालों की आवभगत में मोदी जी अचानक मशगूल हो गए हैं उनको पता नहीं है उस परिवार से आज कितने बेघर विस्थापित होकर घोर समस्याओं के दंश झेल रहे हैं। जैसे कि मेरे ही इर्द-गिर्द ma ,B.Ed प्रह्लाद कुमार बरसों से एक नुक्कड़ में मूली गोभी व इनके पत्ते बेचकर अपने विस्थापित हो चुके परिवार का किस तरह भरण पोषण कर रहा है यह उसी की आत्मा जाने ।बीएससी व मैकेनिकल एंड इंजीनियरिंग डिप्लोमा प्राप्त ललित मोहन भट्ट धूल गर्द शोर भरे गौलातट क्षेत्र पर दिनभर गरीब बच्चों के साथ माथा पच्चीसी या सिर हाथ घोट घोट किस हाल न जाने अपने परिवार और बूढ़े मां-बाप का लालन पालन कर रहा है यह भी मोदी जी को पता नहीं है ,या फिर उसी गर्द भरी सड़क किनारे एक छोटी सी खोलकर एक दीर्घ अनुभवी फार्मेसिस्ट नीरज जोशी बरसो संघर्षों के बाद भी आज किस हाल अपने उज्जवल भविष्य की प्रतीक्षा में आधी राह में कमर बांधे खड़ा है यह भी मोदी जी नहीं जानते हैं। या फिर स्नातक की डिग्री हासिल एक श्रेष्ठ कारीगर प्रमोद कुमार फावड़ा खोद खोद कर किस हाल अपने विस्थापित परिवार के भविष्य निर्माण की उम्मीद बांधे खड़ा है यह भी एक चिंतनीय विषय है।

जहां करोड़ों जनता आज उस परिवार से बेघर विस्थापित है लाखों मेहनतकश फुटपाथ में है ।देश का अपार खजाना या तो आडंबर के मंदिरों में ढेर हो गया या फिर माफिया धन बाहुबलियों के हाथ लूट गया ।उद्योगों का निजीकरण पूजी पतियों का निवेश या कंपनीवाद लाखों हाथों का स्वरोजगार लुट चुका है करोड़ों युवा बेरोजगार जवानी की दर दर डोल रहे हैं ।बैंकों पर संकट है ।महंगाई ने करोड़ों की कमर तोड़ दी है ।मेरा उत्तराखंड जैसा धन-धान्य राज्य क़र्ज़ के भंवर में है। लाखों मजदूर किसानों को लाले पड़ने लगे हैं। हजारों की संख्या में वे अकाल मौत के हवाले हो रहे हैं। महामहिम स्वर्ग तीर्थ दिव्य भूमि में सुरा शराब कबाब अय्याशी भोग भक्षण की दरिंदगी छल पाप दुराचार दुष्कर्म हत्या बलात्कार की चीख-पुकार आदि मानवता का दिल चीर रही है। लफ्फाजी लफंगेबाजी चोरी डकैती गुंडागर्दी से लेकर उग्रवाद आतंकवाद आदि सब जीभ फैला कर आमने-सामने हैं ।हर तरफ घोर विषम परिस्थितियों आपदाओं की मार झेल रही भारत भूमि पर आज मोदी सरकार को किस नई नागरिकता की आवश्यकता पड़ गई है ?यहां के मौलिक वाशिंदों को किन प्रावधानों के मकड़जाल में कैद करना चाह रही है?

यह तो ठीक है कि शरणार्थियों को नागरिकता दे दी जाए मगर यहां के नागरिकों की नागरिकता का क्या हुआ जो आज घोर बुरे दिनों की त्राहि त्राहि देख रहे हैं। यह तो ठीक है कि विभाजन के बाद जो भारत के नागरिक विस्थापित हो गए थे उन्हें आज नागरिकता सूची में रख लिया जाए जैसे कि विभाजन के बाद 10 लाख हिंदू पाकिस्तान से पीड़ित होकर भारत आए थे मगर जो तुम भारत भूमि को दुनिया के उत्पीड़ितों का पनाहगार बनाकर अपने आप को दुनिया का हितैषी दिखाना चाह रहे हो यह फिलहाल अभी देश काल के प्रतिकूल अभिसाप सिद्ध हो सकता है।

हिंदू ,सिख ,ईसाई, बौद्ध, जैन व पारसी समुदाय के शरणार्थी तो इस बिल के अनुसार भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं मगर मुस्लिम समुदाय ऐसा नहीं कर सकता है यही मुख्य कारण बन गया है कि आज यह विधेयक उग्र विरोध की चपेट में है ।अब मान लिया जाए पाकिस्तान में कोई कबीर या अब्दुल कलाम बेचैन बैठा हो उसे गंगा यमुना की वादियों या हिमालय की घाटियों में आकर चैन मिले तो वह यहां की नागरिकता हासिल नहीं कर सकेगा क्योंकि वह तो मुसलमान है वह मुस्लिम बाहुल्य बीहड़ देशों में ही भटकने के लिए विवश होगा।

हम यह भी मानते हैं कि पाकिस्तान अफगानिस्तान श्रीलंका और बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों में एक अकेले बांग्लादेश से आने वाले मुसलमानों को ही देश में नहीं संभाला जा सकेगा मगर उन्हें यहां आने या लाने की आवश्यकता ही क्या है उनकी वही व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए ?इस विधेयक में उन्हें बेजां अलग दिखाने की आवश्यकता ही क्या है ?धर्मनिरपेक्ष देश का मतलब यह नहीं है कि वह दुनिया के करोड़ों पीड़ितों को न्योता दे रहा हो मगर यह है कि हर धर्म का व्यक्ति जो मदर टेरेसा ,एनी बेसेंट की तरह या फिर ह्वेनसांग व फाह्यान की तरह भारत भूमि से प्यार जोड़ने के लिए आए और यहां की नागरिकता प्राप्त करना चाहे तो उसे यहां नागरिकता प्रदान करने का सर्वमान्य प्रावधान है ।भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 को आज संशोधित अधिनियम 2019 में तब्दील करने की तुरंत क्या आवश्यकता हुई ।भारतीय नागरिकों को आज अपनी नागरिकता कायम रखने के लिए किन-किन असंभव प्रमाणों को जुटाना होगा ?मुसलमानों को छोड़कर भारत में दुनिया के कितने साथी आते रहेंगे तब यहां के मौलिक नागरिक कहा को जाते रहेंगे ?यह करोड़ों घर से बेघर विस्थापित नागरिक अपने परिवार में पुनः कब वापस आ सकेंगे ।

मै तो सवा लाख बिस्थापितो के बनगांव में रहता हूं, मेरे पास सिर छुपाने को छत नहीं ।मैं भारत भूमि की अन्तः चुनौतियों को समर्पित एक बेघर संदेशवाहक हूँ। शरणार्थी तो खैर शिविरों में व्यवस्थित व सुरक्षित हैं मगर मेरे इर्द-गिर्द अंधकार व नर्कहाल में डूबे हुए सैकड़ों बनगांव किस तरह यहां जिंदगी की सांस भर रहे हैं यह भी मोदी जी नहीं जानते हैं ।अपने हक हुकुब के लिए यहां कितनी जनता बलिवेदी पर चढ रही है ,कितनी जनता रोटी कपड़ा और मकान के लिए तरस रही है और कितने आम नागरिक अपने पारिवारिक और सामाजिक अस्तित्व के लिए जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं ।यह भी देश में आपात स्थितियों का जैसा नजारा है मगर मोदी जी का यह आवभगत का नजारा क्यों बेजां देश को आपात की ओर खींच रहा है ?

उन शरणार्थियों बंधुओं की व्यवस्था सुरक्षा भी अवश्य की जाएगी मगर पहले इन करोड़ों आम नागरिकों की घोर समस्या और अव्यवस्था की याद क्यों नहीं? मोदी जी का कहना है कि यह नागरिकता संशोधन अधिनियम भारतीय इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा ।मगर देश पश्चिम बंगाल ,असम ,बिहार ,उत्तर प्रदेश ,मध्य प्रदेश ,उत्तराखंड ,कर्नाटक, दिल्ली आदि से होते हुए दिल्ली जामिया विश्वविद्यालय ,अलीगढ़ विश्वविद्यालय आदि से लेकर भारत में मुस्लिम समुदाय के आक्रोश की आग में खलबला उठा है ।दर्जनों मौत के घाट उतर गए और सैकड़ों घायल हो चुके हैं फिर भी मोदी जी करारा जवाब जुटाने की कुब्बत लड़ा रहे हैं ।वहीं इस आपात कारी हिंसक वारदातों की चपेट में आए देश के शिक्षा विद संयुक्त बयान में कह रहे हैं कि मोदी जी ने भूले बिसरे की सुध ली है इसके लिए उन्हें धन्यवाद ।

हम उन शिक्षाविदों का भी ध्यान आकर्षित करना चाहेंगे कि उन्हें पहले देश की बिक रही लूट रही शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए और इस अति आपत्तिजनक घड़ी में यह विशेष ध्यान देना चाहिए कि यहां के करोड़ों शिक्षित किस हाल वंचित और कंगाल हो गए हैं ।कुछ भूले बिसरे को याद कर लेने की यह जीद अभी देशकाल को उपद्रव की आग से बचाने के लिए क्यों न थम सकती है? इस संकट की घड़ी में क्यों न देश की सुख-शांति हेतु संसद का नैतिक कर्तव्य हो कि उसे इस अधिनियम को पुनर्विचार व सर्वमान्य सहमति के तहत उचित प्रावधानों के लिए वापस ले लेना चाहिए ।

विरोध की आग यह भी कह रही है कि पहले हम करोड़ो मूल नागरिकों का उत्पीड़न बंद करो तब कहीं विरल भूले बिसरो की याद करो ।पाखंड के अड्डों अखाड़ों में ढेर अकुल काला भंडार हमें दो हम उसे सफेद कर दिखाएंगे और नया भारत बसाएंगे ।हम अपना कारोबार बसाएंगे और अपने शरणागत बंधुओं को भी उसके साथ शामिल करेंगे ।

अंततः सरकार एवं जनता दोनों से तहे दिल अनुरोध है कि देश की सुख शांति और आपसी भाईचारों को ध्यान में रखते हुए अगला कदम उठाना चाहिए ।जब अचानक आग लग जाती है बुझाना चाहिए। हमारा भारतीय समुदाय कई ऐसी त्रासदीओं से गुजर चुका है आज फिर देश उसी मोड़ पर आ खड़ा है ।अपनी अपनी जीद पर देश की ताकतें आज देश को किसी महा विनाश की ओर खींच रही हैं ।अतः सभी उत्तरदाई ताकतों से हम कहना चाहते हैं कि उग्र हिंसक मार्ग ना अपनाकर सब्र करते हुए शांतिपूर्वक एक सर्व सम्मत प्रावधान के लिए सहमति बनानी चाहिए ।किसी शरण में आए या भूले बिसरे की याद करना तो अच्छी बात है मगर पहले इन करोड़ों आक्रोशित ओं को सहमत करना अति आवश्यक हो गया है। इसलिए जल्दबाजी में जो भी भूल चूल रह गई है या जो भी गलतियां रह गई है उन्हें सभी पक्षों को दरकिनार कर एक नया प्रावधान प्रस्ताव घोषित करना चाहिए ।इसी सब्र में देश का अति निकट भविष्य किसी अपूर्व संकट से बचाया जा सकता है ।।धन्यवाद !

आपका बेघर जनकवि निर्दल बंधु

युग चेतना संघर्ष संघ,

मिनी उत्तराखंड बिंदुखत्ता नैनीताल

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