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  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

वह स्वप्न बिकार होगा ।।जनकवि निर्दलबंधु

पर्दे डाल डाल चोगे ओट ओट कर शहंशाह कब तक चमकदार होगा । दहशत में होगी सरहद देश की अफरातफरी में घर गांव परिवार होगा ।।

सबसे बड़े अपराधी के हाथ जब यहां देश का सर्वोपरि कार्यभार होगा । तब क्यों न फल-फूल रहे होंगे अपराध सुशासन कहां वह स्वराज होगा ।।

युग चेतना संघर्ष की सोच में जूझ रहा यह बेघर संघर्षकार होगा । नदी नालों में बह रहा होगा वह धन उमड़ रहा मोदी का वह स्वप्न विकार होगा ।।

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