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  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

वक्त पर ।।जनकवि निर्दलबंधु

कागज का फूल कभी महकता नहीं बगुला दूध से पानी अलग करता नहीं । फिर हंस का भेष बदल कर चलना क्या वक़्त पर जो खरा उतरता नहीं ।।

एक आने एक जाने के दो किनारे हैं बीच मझधार नाव न वार न पार है । सत साहस की पतवार उलझ पड़ी तो खेवन हार संभलना दुश्वार है ।।

दिल लूट कर जिंदगी लूटने वाले खुद लुट गए दिल्लगी लगाने वाले । बदनशीबी ही काम आएगी एक दिन बदनियत से बंदगी दिखाने वाले ।।

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