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  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

ये जाने वाले ।।जनकवि गंगाराम आर्य

कहां जा रहा है ये जाने वाले मन में है अंधेरा दीया जलाले । पावन गंगा के जल से चाहे तन धोने को रोज नहा ले ।।

टीका चंदन भी खूब लगा ले अरे पहले मन का मैल बहाले । उजाला होगा नहीं दुनिया में दिवालियां चाहे लाख जला ले ।।

पोथी पतडी रटले रटाले तीर्थों में चाहे उम्र बिताले । आंखों में झाई पांवो में छाले रे अंतकाल पड़ जाएंगे लाले ।।

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