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  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

यह जवान देश के ।।जनकबि निर्दलबंधु

यह जवान देश के आज फिर संभल के चल । मुश्किलों में देश है घरानों से निकल के चल ।।

अच्छाइयां तो घुट रही ये उठ रही है बुराइयां । पहाड़िया खिसक रही दुख रही है घाटियां ।।

सरहदों में द्वेष है सरफिरों से बचके चल । मुश्किल में देश है घरानों से निकल के चल ।।

फिजाएं तो है जल रही घुट रही है यह वादियां । बर्बादिया हो रही है ये उठ रही है आधियां ।।

वक्त अभी भी शेष है सरहदों में डट कर चल मुश्किलों में देश है घरानों से निकलके चल ।।

सच्चाईया तो सिमट रही उमड़ रही है दुश्वारियां । तनहाइयां भड़क रही संभल रही है क्रांतियां ।।

ये वतन के लिए संदेश है स्वदेश के हित बढ़ते चल । मुश्किलों में देश है घरानो से निकल के चल ।।

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