Search
  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

मेरे वतन के साथी ।।जनकवि गंगाराम आर्य

ओह हमसफर मेरे वतन के साथी मेरे चमन को जलाना छोड़ दे अब । एक दिन होगा खुद मुट्ठी भर खाक मेरे अमन को मिटाना छोड़ दे अब।।

हम अनेक मगर एक हैं सब बैर भाव की आग लगाना छोड़ दे अब। अनगिनत सुहाग उड़े चिराग बुझे ये वतन को तड़पाना छोड़ दे अब।।

वे सोमनाथ मथुरा धाम लुटे अरे घर आगन लुटाना छोड़ दे अब। वह सोने की चिड़िया उड़ गई कहां मौज बहार उड़ाना छोड़ दे अब।।

2 views
  • Facebook
  • Instagram
  • YouTube