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  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

'नया भारत-संदर्भ सार'

Updated: Apr 24

"आदर्श लोकतंत्र की रीति परंपराओं ,मान मर्यादाओं व नीति व्यवस्थाओं की सरेआम धज्जियां उड़ाने वाले स्वेच्छाचारी निरंकुश व अनगढ़ राजाओं में नरेंद्र मोदी का नाम सर्वोपरि रहेगा। अपने आप को सबसे समझदार हितेषी वह ईमानदार चौकीदार दिखाने की कपट भरी नियत से नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी से लेकर आज एनआरसी,सी ए ए तथा अभी बिना किसी पूर्व सूचना, सहमति तथा बिना किसी पूर्व आवश्यक व्यवस्था के अचानक रातों-रात लॉक डाउन तक स्वेच्छाचारी निर्णय लेकर देश के आम नागरिकों या हाड़ तोड़ मेहनतकश मजदूरों, किसानों, गरीब तबकों, पिछड़े वर्गों तथा ईमानदार लेखक कलमकारों,विचारकों तथा जनसेवीयों को लगभग अकाल मौतों के मुंह में ही झोंक डाला या कगार पर ला खड़ा किया है ।"

यहां आदि सनातन काल से ही आज हजारों वर्षों तक अनन्य राजाओं की यही बृत्ति प्रवत्ति अपना साम्राज्यवादी अधिकार स्थापित करती रही है ।मानवता के मौलिक सिद्धांत व अस्तित्व के सतत हनन दमन व पतन में ही इन्हें सदा संतुष्टि मिली है। वहीं देश की आम जनता निरंतर गुमराह होकर यातनाओं के घोर दंश झेलने को विवश हुई है। आज का ताजा नजारा दलित स्वर्ण,हिंदू-मुस्लिम, अमीर ,गरीब उँच नीच के साथ ही घोर छल पाप दुराचार ऐश भोग भक्षड़ लूट अधर्म अन्याय भरी त्रादशी आप सबके सामने हैं ।अतीत के सभी महापुरुषों ,दिव्य दिवंगत आत्माओं, संघर्षकारों, सुधारकों, विचारकों के अपार अथक संघर्ष व प्रयासों को नमन करते हुए यह बेघर जनकवि निर्दलबंधु गंगाराम राज भी आज चार दशक से उन्हीं प्रयासों को अग्रसर करने की चेष्टा में अपना समस्त जीवन व्यतीत कर चुका है ।इसी चेष्टा में हारे थके मांदे कवि पर दिव्य चेतना चुनौतियों ने पुनरजिन्दगी देकर इसके प्रयास को आज साक्षात चेतना संवेदना और प्रेरणा प्रदान की है ।और उन्हीं चेष्टाओं की उपेक्षा व अनसुनी आज इस देश को महा संकट की ओर लेकर आई है ।

अतः सभी सुधि पाठकों से इस अंतिम चेष्टा के तहत 2 अप्रैल 2018 से स्वयं लाकडाउन की जैसी स्थिति में कवि द्वारा राष्ट् के नाम तैयार 500 कविताओं के संग्रह को सहृदय स्वीकार करने की परम अपील की जाती है ।साथ ही कवि द्वारा युग चेतना संघर्ष संघ के तहत 'नया भारत' एक अंतः चेतना संवेदना की एक कल्पना मात्र है जो आप सभी के स्नेह सद्भाव व सहयोग से ही साकार हो सकती है ।कवि की इस अंतिम चेष्टा में नीरज जोशी जैसे युवा का अमूल्य व चिरस्मरणीय सहयोग कवि की जिंदगी में एक सर्वश्रेष्ठ मानवता का अध्याय जोड़ देता है, साथ ही एक सामान्य निर्धन बेरोजगार सुरेंद्र कुँवर की इस चेष्टा के प्रति समर्पित भावना भी आप सभी से आग्रह करती है कि कवि का नया भारत साकार करें ।

"नया भारत "नामक इस शोध् संग्रह में उन्हीं अनन्य राजाओं व उनसे संबंधित देश काल की परिस्थितियों का समाधान अब आपके ही धैर्य साहस और संघर्ष पर निर्भर है। अतः आएं एक और चेष्टा आगे बढ़ाएं ।कष्ट हेतु धन्यवाद !

आपका शुभचिंतक जनकवि निर्दल बंधु गंगाराम राज

मिनी उत्तराखंड। नैनीताल ।।


"अरे सख्स अब तो चेत"-(1)



अरे शख्स मोदी सत्ता के भोगी

मेहनतकशों का भक्षण करते रह ।

कहां 15 लाख इनके खातों में ?

धन्ना सेठों के खजाने भरते रह ।।


29 जनवरी को यहां पहला संक्रमण

कौन पूछे शहंशाह बस चलते रह।

12 फरवरी को राहुल सचेत करे तो

मगर कांग्रेसी वह उपहास करते रह ।।


24 फरवरी ट्रंप का समारोह बुला

लाखों भीड़ जुटा प्रयास करते रह ।

13 मार्च से तबलीगी जमात में भी

देश-विदेश के मुसलमान भरते रह ।।


दर्जनों संक्रमित आमने सामने भी आए

सब ठीक-ठाक चल रहा कहते रह ।

अब सैकड़ों संक्रमित दर्जनों मरे तो

अचानक जनता कर्फ्यू में ठगते रह ।।


अरबों का दूध अंडा फल सब्जी आदि

कोने-कोने से गड्ढे नालों में भरते रह ।

अचानक जरूरतमंद आ बैठे सड़क पर

उनकी हड्डी पसली एक करते रह ।।


इसी खुशी में घर-घर से गधों को

थाली, परात बजाओ कहते रह ।

अचानक संक्रमड़ो व मौतों की संख्या बड़ी

24 मार्च को लाकडाउन हुंकार भरते रह ।।


लाखों विदेशियों को अब यहां बुला

यहां जो जहां फसे वही मरो कहते रह ।

घरों को निकले लाखों अब सड़कों पर

जाने दो चुपचाप रहो तब कहते रह ।।


अब मरने लगे सैकड़ों में यहां

कौन है दोषी कपट जाल बुनते रह ।

अब इक्के दुक्के भी दिखे बाहर कहीं

मार मार भगा घर पर मरो कहते रह ।।


ईरान से हवाई जहाज, हरिद्वार से

डीलक्स गाड़ियों में चहेतों को भरते रह ।

यहां जहां-तहां फंसे लाखों मजदूरों को

वहीं घुट घुट मरने को विवश करते रह ।।


जमाती बार-बार जाने की अनुमति मांगें

वहीं पर बने रहो उनसे कहते रह ।

28 मार्च अजीत डोभाल को भेज वहां

उनके भी कान खूब भरते ऐंठते रह ।।


फिर मौलाना शाद भाग गया कह दे अरे

अभी मौका है खूब सडयंत्र रचते रह ।

कोरोना खुद फैला दिया सरेआम यहां

अब सारा दोष जमातियों पर मढ़ते रह ।।


पुलिस की छाती में चढ़कर भाग गए कैसे

जमाना समझ गया सब तू बकते रह ।

पहले जुटा फिर भगा उन्हें वहां से

फिर उनके पीछे हाथ धोकर पड़ते रह ।।


वे संक्रमित हुए तो हुए कैसे बता

खुद जिम्मेदार मगर खूब बचते रह ।

मुरैना में दो से 28 हजार संक्रमित

वे मुसलमान नहीं अरे उन्हें ढकते रह ।।


मध्यप्रदेश में धूमधाम से सरकार बना

कर्नाटक में शादी समारोह देखते रह ।

वही जन्मदिवस पर भारी भीड़ लगने दे

योगी को मंदिर महोत्सव करते दुबके रह ।।


रोगियों से दवा छीन अमेरिका भेज

नमामि ट्रंप, नमस्ते ट्रंप जपते रह ।

न स्वास्थ्य सुविधा न जाँच उपकरण आदि

अनहोनी होने वाली है तू देखते रह ।।


बस मोमबत्ती जला जश्न मना ये शख्स

हर गधे गीदड़ सियार से कहते रह ।

क्या पता उन्हें आज प्रकाश पर्व क्यों यहां

एक तरफ मुंह छुपा खूब हँसते रह ।।


लॉक डाउन तो बहुत अनिवार्य था समय से

अब तो प्राण लेवा शिकंजा कसते रह ।

ऐलान करने आ 14 अप्रैल से 3 मई तक

तिथियों का तुक्का तालमेल रचते रह ।।


हर राज्य ,जिले, गांव, नगर ,शहर, कस्बे में

कौन पालन नहीं कर रहा है नजर रखते रह ।

गली गलियारों बंद कोठरियों सड़क मैदानों में

कौन घुट मर रहा है कहने से बचते रह ।।


लाखों करोड़ पीएम केयर में बटोर

अब औरतों के गहने भी तकते रह ।

70 अरब डॉलर ट्रंप से भी कर्ज में

अरे खूब मिला है जाम गटकते रह ।।


साढ़े छः हजार करोड़ मूर्तियों में खर्च

अब ढोंग पाखंड की भीख लपकते रह ।

फूंक गया डेढ़ हजार करोड़ विदेश यात्रा में

अरे मस्त बहार अमन चमन करते रह ।।


सवा पांच हजार करोड़ बिज्ञापनों व प्रचार में

अभी धन्ना सेठों के चैनलों में चमकते रह ।

बिकाऊ गोदी मीडिया भी साथ है तेरे

आम जनता को गुमराह खूब करते रह ।।

36000 करोड़ कहां राफेल का

खूब हनन गमन पतन करते रह ।

कहां गया लाखों करोड़ बैंकों का अरे

चोरी दबाके कर ,चोर से भी कहते रह ।।


तभी ईमानदार चौकीदार कहलाएगा

गुरु अनग़ढ़ आसाराम के चरण पकड़ते रह ।

आवाज उठाता है तेरे खिलाफ जो कोई

जेल कर दे उसे या दमन करते रह ।।


कोई सुझाव दे अगर विकराल घड़ियों में

तू उसी का खूब उपहास मजाक करते रह ।

बस चंद दिनों की नौटंकी है अब तो चेत

अच्छे दिन आ गए हैं मत कहते रह ।।


सच 2 अप्रैल 2018 से लाकडाउन में हूं

इस हवाले पर आश्चर्य मत करते रह ।

500 कविताओं का संग्रह शोध लिखा है तब

सब छोड़-छाड़ अब इसी को पढ़ते रह ।।


"अरे सख्स अब तो चेत "-(2)


अब तू भी सुन ले ए वतन के साथी

घोर संकट से खुद लड़ते रह ।

शोध् संधान कर परिस्थितियों का

घरों से निकल के चल बचते रह ।।


पीएम केयर, जनता केयर में बदल

पीएम जंतर मंतर में मत भटकते रह ।

आपस में मत लड़ सोशल डिस्टेंस बनाकर

फिजिकल डिस्टेंस बनाकर चलते रह ।।


' संकट मुक्ति संघर्ष समिति 'बनाकर लड़

खास काम श्रृंखलाबद्ध होकर करते रह ।

घर घर से जरूरतमंदों को खोज निकाल

हर समस्या का समाधान करते रह ।।


हर हितैषी सामाजिक संगठन और

जन सेवी ताकतों से भी जुड़ते रह ।

हर आवश्यक चीज उपलब्ध करा यहां

चुनौतियों से लड़ते रह लड़ते रह ।।


बड़ा खतरा है संक्रमण से अभी अरे

कौन फैलाया कैसे थमेगा समझते रह ।

बाहर निकलना मुश्किल हो सकता है अभी

वक्त के रहते आवश्यक व्यवस्था करते रह ।।


अगर वक्त यह हाथ से निकल गया

समझ ले फिर खाली हाथ मसलते रह ।

तबाह हो गया है सारा दुनिया आज देख

अभी भी हीला हवाली मत करते रह ।।


संक्रमण दबाया गया है अभी यहां

अब अधिक इंतजार मत करते रह ।

न दवा, न उपकरण, न व्यवस्था है यहां

धोखा है साथी विश्वास मत करते रह ।।


इस निर्दल बेघर को अभी मान अरे

अब तो चेत ओ सख्स संघर्ष करते रह ।

एक दिन आना एक दिन जाना अरे

कदम कदम इसी राह में बढ़ते रह ।।


जनकवि निर्दलबंधु ।।

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