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  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

तो क्या करें ।।जनकवि निर्दलबंधु

इस दुनिया का खेल निराला है कहीं घोर अंधेरा कहीं तेज उजाला है । किसी को जी भर जाम मिला तो कोई दरिया किनारे प्यासा है ।।

चमकते रेत को मृग पानी समझ भटकते तपते और तड़पते हैं । जिस्म के तेज में ऐसे नासमझ तप तप जल भर मिटते हैं ।।

ये इल्म ये जुल्म ढह गए गजब दुनिया लवलीन हो गई क्या करें । चांद सितारों की महफिल से क्या वादियां गमगीन हो गई तो क्या करें ।।

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