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  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

क्यों न संभल जाता ।।जनकवि निर्दल बंधु

रे मनवा तू संभल जाता यह दुनिया क्यों बिगड़ जाता । पलक भर में बहक जाता कदम भर में बदल जाता ।।

यह मन एक ऐसा पंछी है मायावी जाल में उलझ जाता । उलझ कर पंख न फड़क पाता फड़क फड़क घुट तड़प जाता ।।

यह मन एक ऐसा पुतला है मायावी जोत में झपट जाता । झपट जल जल झुलस जाता झुलस तड़प प्राण निकल जाता ।।

यह मन एक ऐसा भंवरा है पंखुड़ियों में लिपट जाता। शाम ढली फूल सिमट जाता सिमट सिमट वही दबक जाता ।।

यह तन एक ऐसा पिजड़ा है यह पंछी न जाने कब निकल जाता । यह तन मन न हुआ अपना किसी का रे मनवा क्यों न समझ पाता ।।

यह जग एक ऐसा सपना है न जाने कब कहा बिखर जाता । अनमोल रतन है मानस तन रे मनवा क्यों न संभल जाता ।।

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