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  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

एक स्वर्णिम युग क्रांति ।।जनकवि निर्दलबंधु

मुद्दतों की घुटन यहां आज एक कलम तले सज रही है । एक शोध संधान जिंदगी भर आज एक संकलन रच रही है ।।

दर्द हाल गोला तट है यहां किस हाल जिंदगी सिमट रही है । ना बिजली पानी है मय्यसर यहां उमस भरी रात गुजर रही है ।।

चिराग तले दिख रहा है सच नवनिर्माण की मशाल सुलग रही है । पुनः संघर्ष संघ बनेगा देश एक स्वर्णिम युग क्रांति उमर रही है ।।

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