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  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

एक चिराग तले ।।जनकवि निर्दलबंधु

करोड़ों गुमराह गोते खा रहे होंगे कितनों की सांस घुट रही होगी । कितनों के प्राण उड़ रहे होंगे कितनों की आब उड़ रही होगी ।।

कितनों की सुबह आ रही होगी कितनों की शाम जा रही होगी । बरबादियों की कतारों में लग गए सब कुर्बानियों की आह उठ रही होगी ।।

उन सतपुरुषों की रूह भडक रही अंतः चेतना सत प्रेरणा जग रही होगी । और एक चिराग तले किस हाल यहां निर्दल बेघर की कलम सध रही होगी ।।

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