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  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

उड़ गये प्राण ।।जनकवि निर्दलबंधु

काला धन भ्रष्टाचार नोटबंदी तथा चमकदार अर्थव्यवस्था जीएसटी प्रधान।

करोड़ों गुमराहों को उड़ा ले गया अभी हाल मुद्दतों का एक तूफान।।

घर गांव समाज ग्रस्त त्रस्त है यहां प्रबल है ऐश भोग भक्षण का शैतान ।

हर तरफ घुट रहा है मुल्क मुकाम अरे शहंशाह हुए हैं जहां मेहरबान ।।

7 की संजना 80 की अम्मा के दरिंदियों के हवस में उड़ गए प्राण।

क्यों हौसले बुलंद हैं दरिंदगी के हमराहों के कब खुल सकेंगे आंख कान ।।

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