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  • जनकवि निर्दलबंधु ।।

आहटें दी हैं अन्तः से

मेरा देश भारत धरती का स्वर्ग खंड है ।सनातन काल से यहां लिप्त लोलुप ताकतों ने यहां की अपार सुख समृद्धि व मानव शक्ति का शोषण व दुरुपयोग किया है ।निजी स्वार्थ व अमन चैन की बृत्ति प्रवत्ति से प्रेरित ताकतें निरंतर प्रभुत्व व दमन के बलबूते देश को निरंतर तंगहाल निहाल व बेहाल करती रही हैं। आज यह बृत्ति प्रवृत्ति अपने चरम शीर्ष पर है और देश अपूर्व संकट की ओर है ।इसी संदर्भ में जनकवि निर्दल बंधु ने 2 अप्रैल 2018 से अब तक दिन रात सिर हाथ घोट घोट कर लॉक डाउन की जैसी स्थिति में ही एक कविता संग्रह तैयार किया है ।यह लगभग 500 कविताओं का संग्रह है जिसका नाम "नया भारत" लिया गया है। आज के आला आकाओं ने वक्त के रहते सियासत में मौज बहार लूटी है और आज भी उसी प्रवृत्ति से प्रेरित होकर देश को कोरोना के आगोश में झोंक डाला है।

संग्रह का अंतिम भाग अभी वर्तमान परिस्थितियों के साथ ही समाप्त होने जा रहा है ।इस भाग में लगभग 50 कविताएं शामिल हो चुकी है ।

अतः इसी भाग की प्रथम कविता से लेकर आपके समक्ष कुछ कविताएं क्रमशः प्रस्तुत हैं ।

अन्ततः आप सभी से अपेक्षा है कि देश का भविष्य सुनिश्चित करें।



कविता- 1


*आहटें दी हैं अन्तः से ।।


मिनी उत्तराखंड कहलाता मेरा गांव है

36 वर्ग किमी में आबादी सवा लाख है ।

यह उत्तराखंड की आपदाग्रस्त बेघर विस्थापित

आंदोलित जनता की ऐतिहासिक वसासत है ।।


प्रिंट मीडिया से जुड़कर यहां तीन दशक

जन सरोकारों को दी आवाज है ।

'देश संकट की ओर 'शीर्षक अभी गवाह है

अब तक गुजर गया 10 साल है ।।


अभी छह माह पूर्व गूगल पेज में भी लिखा था कि

आने वाला कोई अपूर्व आपात है ।

कई आहटें चेतनाएं संवेदनाएं दी है अन्तः से

अनसुनी का नतीजा आज यह जंगलराज है ।।

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